Sunday, October 28, 2018

PINE OF MY POEMS

खिड़कियों के खुलने का समय आगया,
जालों की परत ने अपने आप ठीकाना समेट लिया,
जंग लगी सिटकनीया, सालों पहले बंद हुई , आज ख़ुद ब ख़द टूट कर गिर रही है !
शायद मन में उठे जलजले के आगे टिक न पायी।
या फिर ख़ाक की महक और सह न पायी। 
खिड़की खुलते ही जब गिली सी एक रोशिनी ने ख़ाक को पीला किया, तो अंधेरे की रूह को भी परछाईं मिल गयी ।

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