खिड़कियों के खुलने का समय आगया,
जालों की परत ने अपने आप ठीकाना समेट लिया,
जालों की परत ने अपने आप ठीकाना समेट लिया,
जंग लगी सिटकनीया, सालों पहले बंद हुई , आज ख़ुद ब ख़द टूट कर गिर रही है !
शायद मन में उठे जलजले के आगे टिक न पायी।
या फिर ख़ाक की महक और सह न पायी।
या फिर ख़ाक की महक और सह न पायी।
खिड़की खुलते ही जब गिली सी एक रोशिनी ने ख़ाक को पीला किया, तो अंधेरे की रूह को भी परछाईं मिल गयी ।
No comments:
Post a Comment