पंख के निशान !
उड़ान को संभाले रखना हैं बस,
पंख कितने ही घायल क्यूँ न हो,
हवा का रूख कितना ही बेरूखा क्यूँ न हो,
रात की सिहाई कितनी ही कलिख क्यूँ न लगा दे,
या फिर सुबह उन्हें कितना ही ख़ानाबदोश क्यूँ न बना दे,
बादलों में भरे पानी से न तो डरना,
न ही आसमान के रंगो में खों जाना,
नज़र को चाह और राह से बँधे रखना,
उड़ान की कोई मंज़िल नहीं होती,
मगर तय कर लिया है तो एक ख़ूबसूरत उड़ान उड़ते रहना ही मंज़िल बन जाती है।
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